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एक ही परीक्षा, एक ही डिग्री, अलग-अलग नतीजा: 69000 भर्ती में बी.एड. का सवाल

यह लेख एक पक्ष का तर्क रखता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। अपने मामले के लिए अपने अधिवक्ता से ज़रूर पूछें।

दो अभ्यर्थियों की कल्पना कीजिए। दोनों के पास बी.एड. की डिग्री है। दोनों ने जनवरी 2019 में एक ही परीक्षा दी, एक ही विज्ञापन के तहत।

पहले की नियुक्ति 2020 में हो गई। दूसरे की भी होनी चाहिए थी, लेकिन आरक्षण गलत ढंग से लागू हुआ और वह सूची से बाहर रह गया। 2023 में बी.एड. पर कानून बदल गया। आज पहला अभ्यर्थी नौकरी में है और सुरक्षित है। दूसरे को शायद कभी नौकरी न मिले।

इन दोनों के बीच फ़र्क़ सिर्फ़ एक है: वह गलती जिसे राज्य ख़ुद मान चुका है। पूरा घटनाक्रम टाइमलाइन वाले लेख में है।

चयन के समय दोनों समूह पात्र थे

28 जून 2018 की NCTE अधिसूचना ने बी.एड. धारकों को प्राथमिक शिक्षक पदों के लिए पात्र बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने Ram Sharan Maurya v. State of U.P. (18 नवंबर 2020, (2021) 15 SCC 401) में इसी भर्ती पर कहा:

  • पैरा 43: पात्रता "already conferred by Notification dated 28.06.2018" थी, यानी 28 जून 2018 की अधिसूचना से पहले ही मिल चुकी थी।
  • पैरा 46: "the B.Ed. candidates were rightly allowed to participate in the instant selection process." यानी बी.एड. अभ्यर्थियों को इस चयन में भाग लेने देना सही था।
  • पैरा 69: राज्य 12 मई 2020 के परिणाम से सभी पद भर सकता है।

बाद में Devesh Sharma (11 अगस्त 2023) के पैरा 36 में भी कोर्ट ने माना कि वह अधिसूचना "was binding ... till it was declared illegal", यानी अवैध घोषित होने तक बाध्यकारी थी।

रेखा कहाँ खींची गई

Devesh Sharma v. Union of India (11 अगस्त 2023) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बी.एड. प्राथमिक शिक्षक के लिए योग्यता नहीं है।

8 अप्रैल 2024 के स्पष्टीकरण में कोर्ट ने 11 अगस्त 2023 से पहले नियुक्त शिक्षकों को सुरक्षा दी। कारण यह बताया कि "a large number of candidates with B.Ed. degree had already been appointed on the basis of eligibility criteria specified by the educational authorities" और उन्हें हटाना "equitable" नहीं होगा। यानी बड़ी संख्या में बी.एड. धारक उस समय के नियमों के आधार पर नियुक्त हो चुके थे, और उन्हें हटाना न्यायसंगत नहीं था।

इन शिक्षकों को ब्रिज कोर्स पूरा करना है। NIOS ने यह कोर्स 16 सितंबर 2026 से शुरू किया है।

आँकड़े

समूहसंख्यास्रोत
इस भर्ती से सेवा में कार्यरत बी.एड. शिक्षकलगभग 32,000 से 40,000। कोई आधिकारिक गिनती नहीं हैएक संघ नेता का बयान; कोर्ट में वकील का कथन (ब्लॉग के अनुसार)
राज्य की 2026 की सूची में वे अभ्यर्थी जो पहले चयनित थे पर नियुक्त नहीं हुए4,946: 2,649 बी.एड. और 2,297 BTCराज्य के हलफ़नामे का ब्लॉग सारांश
8,270 नामों की सूची में बी.एड. धारकलगभग 4,766प्रसारित संलग्नक की गिनती

ये आँकड़े किसी अदालती आदेश से नहीं हैं। इन्हें अनुमान के रूप में पढ़ें।

दोनों समूहों में फ़र्क़ क्यों है

  • राज्य ने माना है कि 2020 की सूचियों में आरक्षण गलत ढंग से लागू हुआ।
  • आरक्षण सही लगता तो इन अभ्यर्थियों की नियुक्ति 2020 में हो जाती, यानी Devesh Sharma के फ़ैसले से तीन साल पहले।
  • इन्होंने उन्हीं पात्रता नियमों पर भरोसा किया जिन पर आज सुरक्षित शिक्षकों ने किया था।
  • संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है। तर्क यह है कि जो भेद सिर्फ़ राज्य की अपनी गलती पर टिका हो, उसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।

यह तर्क कार्यरत बी.एड. शिक्षकों की नियुक्तियों के वैध होने पर ही टिका है। उनकी नियुक्ति पर यहाँ कोई सवाल नहीं है।

ये अभ्यर्थी क्या माँग रहे हैं

  • 8 अप्रैल 2024 के आदेश के लिए उन्हें 2020 के बैच का हिस्सा माना जाए।
  • ब्रिज कोर्स पूरा करने की शर्त पर नियुक्ति दी जाए, एक बार के उपाय के रूप में।

इसके लिए दो उदाहरण दिए जाते हैं:

  • U.T. of J&K v. Saba Wani (30 अप्रैल 2026, 2026 INSC 439): मुक़दमेबाज़ी की वजह से अटके शिक्षक अभ्यर्थियों को, जिनके पास न्यूनतम योग्यता नहीं थी, इस शर्त पर नियुक्ति दी गई कि वे 3 साल में योग्यता हासिल कर लें।
  • 23 अगस्त 2010 की NCTE अधिसूचना: बी.एड. धारकों को कक्षा 1 से 5 के लिए नियुक्त किया जा सकता था, बशर्ते वे नियुक्ति के बाद 6 महीने का कार्यक्रम पूरा करें।

दूसरा पक्ष

इस तर्क के सामने कठिनाइयाँ भी हैं, और उन्हें जानना ज़रूरी है।

  • 8 अप्रैल 2024 का आदेश कहता है: "mere selection ... will not entitle them for a benefit"। यानी सिर्फ़ चयन होने से लाभ नहीं मिलेगा।
  • Navin Kumar v. Union of India (28 अगस्त 2024), पैरा 10: "What is important is the date of appointment." यानी अहम बात नियुक्ति की तारीख़ है।
  • BTC और D.El.Ed. अभ्यर्थियों का तर्क है कि ये रिक्तियाँ उन्हें मिलनी चाहिए।
  • राज्य का बी.एड. पर रुख़ अभी साफ़ नहीं है। उसके हलफ़नामे के बारे में रिपोर्टें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।

अब तक किसी अदालत ने उस स्थिति पर फ़ैसला नहीं दिया है जिसमें अभ्यर्थी राज्य की स्वीकार की हुई गलती के कारण बाहर रहे हों, और वह भी ऐसी भर्ती में जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही सही ठहरा चुका हो। यह तर्क इसी ख़ाली जगह पर टिका है। कोर्ट इसे मानेगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है।

स्रोत